Poem
    Devotion
    whisee

    Bhent (भेंट)

    Lakshya Jain

    September 3, 20263 mins
    ❀
    देख, ये मुट्ठी भर के
    तेरे लिए कुछ लाया हूँ,
    चोरी नहीं की, बस
    बिन बताये छुपा के ले आया हूँ।
    इतने समय से तुझे
    यहीं खड़े देखता आया हूँ,
    आँखों में तेज और हाथों में बाँसुरी
    देखकर मनमोहित हो जाता हूँ।
    बस यही सोचता हूँ,
    जो पुरी दुनिया को संभालता है,
    उसे कौन ही संभालता होगा?
    भले ही तू सर्वोपरि है,
    पर अनगिनत इच्छाएँ सुन कर
    तू भी तो थकता होगा।
    कोई शिकायत लेकर नहीं,
    तेरे पास बैठने आया हूं।
    और तुझे तो पता ही है,
    तेरे बड़े भक्तों भाँति
    सोना-चाँदी व ऊंचे पकवान
    यह सब तो मेरे हक में नहीं
    पर तू चाहे तो आ,
    मेरे बगल में बैठ,
    और ये माखन बाँट ले।
    ❀